Friday, 3 April 2020

संस्कृत विद्वानों/अध्यापकों/छात्रों को समर्पित

आज सुबह प्रधानमंत्री ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि - 'पाँच तारीख नौ बजे नौ मिनट तक सभी लोग अपने घरों में दीपक/मोमबत्ती/टॉर्च या मोबाईल की फ्लैश लाइट्स जलाकर कोरोना के संकट को प्रकाश का परिचय कराना है और जिसका एक मात्र उद्देश्य यह है कि हम सब एक ही मकसद से लड़ रहे हैं यह उजागर हो जाए'|
इस वक्तव्य में उन्होंने किसी भी प्रकार से धार्मिक विचारों को नहीं जोड़ा|

देश में इसके पक्ष और विपक्ष में बोलने वालों के दो धड़े बने और सोशल मीडिया पर अपने-अपने विचार रखने लगे, जो कि किसी भी लोकतान्त्रिक देश के लिए बहुत आवश्यक भी है|

सुबह से ही लोग इस सम्बन्ध में व्हट्सअप, फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट कर रहे थे तो मेरा ध्यान अचानक संस्कृत विद्वानों/अध्यापकों/छात्रों की कुछ पोस्टों और स्टेटस पर गया, तो उनको पढ़कर बहुत ज्यादा ख़ुशी नहीं हुई और मन खिन्न सा ही रहा |

हम किसी का भी समर्थन करते हों उसके लिए अपनी प्राचीन परम्परा को दाँव पर नहीं लगाना चाहिए ऐसा मेरा मानना है| किसी को भी पूर्ण अधिकार है कि वह जिस दल को चाहता हो उस दल की छोटी से छोटी बात के लिए उस बात का समर्थन करे, भले ही वह सही हो अथवा गलत|
   
मैंने आजतक इस महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस तिथि (एकादशी अथवा द्वादशी जो भी तिथि पंचाग के अनुसार उस दिन पड़ रही हो) का इतना महत्त्व नहीं सुना है जितना कि अबकी बार सुन रहा हूँ | इसके बारे में अनेकों तर्क दिए जा रहे हैं जिनका विशेष कोई औचित्य नहीं है| यह बात मैं अपने मन से नहीं कर रहा हूँ| जब मैंने इतनी सारी पोस्ट पड़ी तो सोचा किसी ज्योतिषी से बात करके पूछ लेता हूँ कि क्या सही में पाँच अप्रेल को आने वाली तिथि में  कुछ विशेष है या नहीं? उत्तर मिला ऐसा कुछ भी विशेष नहीं है जिससे कि इसे विशेष कहा जा सके|
नीचे मैं अब कुछ तर्क लिख रहा हूँ जो कि संस्कृत के विद्वानों/अध्यापकों/ छात्रों ने भी पोस्ट किए हैं| इनमें वो ज्योतिषी भी शामिल हैं जिन्होंने परम्परा से अथवा संस्कृत विश्वविद्यालयों से ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन न करके केवल 6 महीने अथवा 1 साल का कोई डिप्लोमा कोर्स किया है और अब ये ज्यादा बड़े तथाकथित ज्योतिषी बने हुए हैं | पाँच तारीख को नौ बजकर नौ मिनट तक इस क्रिया को करने से क्या क्या लाभ हैं, जो उन्होंने कहा है अथवा लिखा है उसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा हूँ-

१.  9 नम्बर मंगल का है इसलिए - नौ बजकर नौ मिनट पर ये कार्य करना है, इससे आपका मंगल स्ट्रोंग होगा, इससे आपकी व्हील पावर बढेगी| ये आपकी इम्युनिटी को भी बढाएगा|
२.  5 तारीख़ का यह महत्त्व है कि - सिंह राशि है पाँचवीं, सिंह राशि अर्थात सूर्य की राशि |और यदि हम दीपक जलाएँगे तो सूर्य को ताकत मिलेगी, सूर्य को ताकत मिलेगी तो उसका प्रकाश चन्द्रमा तक जाएगा उससे चन्द्रमा को भी बल मिलेगा, इत्यादि........|
3.  मोमबत्ती में ज्वार के दाने डालें जिससे राहु का इम्पेक्ट कम होगा|
4. इस दिन मेघनाद का वध किया था|
5. कालसर्प योग, तंत्र, इत्यादि कई उदाहरण|

सभी संस्कृत/संस्कृति प्रेमियों से निवेदन है कि जिस भी दल का आप समर्थन करते हैं उसे करें, लेकिन उसे पुष्ट करने के लिए फालतू में  ऐसे किसी भी क्रियाकलाप से बचें जिसमें कि हमारे पूर्वजों द्वारा सुरक्षित परम्परा पर आघात पहुँचे | कोई सामान्य व्यक्ति यह सब करे तो समझ भी आता है लेकिन परम्परागत रूप से पढ़े हुए भी ऐसा करेंगे तो हम उस 'खूबसूरती' से लोगों को कभी महसूस नहीं करवा पाएँगे जो इस सनातन धर्म की है|

डॉ. कल्पेश बहुगुणा           
         

Friday, 27 March 2020

पंडित जी और कोरोना वायरस .... Pandit ji and coronavirus


मार्च की पहली शाम, सुहावनी शाम,  बारिश की हल्की बूंदाबांदी शुरू हुई ही थी कि पंडित जी ने अपनी धर्मपत्नी को कहा भाग्यवान थोड़ी सी अदरक वाली चाय पिला दो बहुत मन कर रहा है| पत्नी कीचन में गई बड़े प्यार से तीन छोटे-छोटे स्टील के गिलासों में चाय और एक प्लेट में काजू-बादाम ले आई(ब्राह्मणों के घरों में अक्सर काजू -बादाम यजमान द्वारा प्रदत्त होते हैं) और साथ ही अपने बेटे को आवाज़ देते हुए बोली बेटा चाय पीने आ जा|

पंडित जी बारहवीं पास करके दिल्ली आए थे और यहीं पर उन्होंने शास्त्री, आचार्य एवं बी.एड. की परीक्षा दी और बी. एड. में ही घर की विषम परिस्थितियों के कारण शादी भी कर ली| पढाई के लिए घर से पंडित जी ने कभी खर्चा नहीं माँगा था और घर वाले उस स्थिति में भी नहीं थे कि बेटे को प्रत्येक महीने पाँच-छह हज़ार दे सकें इसलिए उन्होंने शास्त्री-आचार्य की पढाई एक आश्रम में रहकर की, और बी.एड. के समय विश्वविद्यालय के नजदीक ही एक कमरा ले लिया था|

पढाई पूरी हुई तो अब घर का खर्चा उठाने की जिम्मेदारी पंडित जी के कंधों पर आ गई, पंडित जी अब अकेले नहीं थे| उनकी सुन्दर, सुशील एवं दूरस्थ शिक्षा द्वारा स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण पत्नी भी गाँव में थी, उसका भी उन्हें ध्यान रखना था| (धर्मपत्नी के परिवार ने पंडित जी से अपनी पुत्री का विवाह इसलिए जल्दी से हाँ कर दिया था कि उनको लगा होगा लड़का इतने वर्षों से दिल्ली में है और बी.एड. करके नौकरी भी शुरू कर ही लेगा)|
  
पंडित जी यूँ तो छात्र जीवन में बहुत खुशमिजाज प्रवृत्ति के थे लेकिन दीक्षांत के उपरांत ये सब खत्म हो गया था| घर की जिम्मेदारियों के कारण वो किसी नौकरी के लिए उस तरह से नहीं पढ़ पाए जिस तरह से बाकी लोग पढ़ रहे थे और वे पंडिताई में पूरी तरह से आ गए थे| दो वर्ष बीत गए उनके सहपाठी अब कोई एम. फिल. कर रहे थे तो कोई पी. एच.डी. बाकी बचे हुए नौकरी की तैयारी|

पंडित जी का सबसे शीघ्रता से कोई कार्य पूरा हुआ था तो वह था पुत्रोत्पत्ति| विवाह के प्रथम वर्ष में ही उन्होंने एक सुन्दर से पुत्र को जन्म दिया| बेटे के छठे महीने में नामकरण के बाद पत्नी ने कहा कि मुझे भी दिल्ली चलना है, इन्होने समझाया कि अभी मैं उस स्थिति में नहीं हूँ कि दिल्ली ले जा सकूँ, कुछ समय बाद ले चलूँगा| एक, दो, तीन, चार वर्ष बीत गए लेकिन पंडित जी की हिम्मत नहीं हुई कि परिवार को दिल्ली ला सकूँ| पत्नी से लड़ाई का यह एक मुख्य कारण हो गया था| पत्नी ने भी एक दिन क्रोध रूपी अग्नि में धधकते हुए कहा यदि तुम मुझे नहीं ले जाओगे तो इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा|

पंडित जी को अब दिल्ली में पाँच वर्ष हो गए थे थोडा बहुत यजमान भी बन गए थे लेकिन अधिकांश निम्न मध्यम वर्गीय परिवार केऔर कुछ उच्च मध्यम वर्गीय| अंततोगत्वा पंडित जी ने न चाहते हुए भी यह फैसला किया कि परिवार को ले ही आता हूँ| वे विगत पाँच वर्षों से एक कमरे में ही रह रहे थे अब उन्होंने दो कमरों वाला घर देखना प्रारंभ किया जो कि सस्ता भी हो, भाग्यवश उनको एक चतुर्थ तल पर मिल ही गया| कमरे का सामान शिफ्ट किया और कुछ नया सामान लिया जैसे - डबल बेड, कुर्षी, मेज, नया टेलीविजन इत्यादि| पंडित जी की जमा धनराशि इसमें बहुत अधिक खर्च हो गई| 

फरवरी महीने का अंतिम सप्ताह:   पंडित जी गाँव परिवार को लेने जा रहे थे तो घर से उनके पिता का फ़ोन आया बेटा एक हीटर और गीज़र लगवा कर जाना बुढापे में ठंड सहन नहीं हो पाती है| (सुकून की बात यह थी कि पंडित जी का छोटा भाई अब बड़ा हो गया था तो वो घर में माँ - पिता जी की सहायता कर लेता था) पंडित जी की कुछ धनराशि उसमें भी खर्च हो गई| अब वे माता-पिता से विदा लेकर अपने छोटे बच्चे और पत्नी सहित दिल्ली के लिए निकल गए| धर्मपत्नी के मुखारविंद पर दिल्ली जाने की एक अलग ही आभा झलक रही थी, पंडित जी सपरिवार दिल्ली पहुँच ही गए, और ये दिन फरवरी का अंतिम दिन था| पंडित जी के पास धनराशि अब केवल इतनी बच गई थी कि मार्च के महीने का किराया दे सकें दस पन्द्रह दिनों का खर्चा चला सकें|

मार्च की पहली शाम :  बेटा अन्दर से आया तीनों लोग बैठकर चाय पीने लगे | पत्नी ने सुनाते हुए कहा - यहाँ कीचन में काजू-बादाम रखे हुए हैं और घर पर मैं इतने सालों से पार्लेजी खा कर काम चला रही हूँ | पंडित जी को समझ न आए कि क्या कहे कि ये यजमान ने दिए हैं या मैं जो दोनों में भोग लगाया था उसमें से लाया हूँ | समझाने का कोई अर्थ नहीं था इसलिए चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी और हँस कर बात को टाल दिया| 

अचानक फोन बजा और देखा तो एक उच्च मध्यम वर्गीय परिवार वाले यजमान का कॉल था| पंडित जी ने फोन उठाया - उधर से आवाज आई - गुरूजी प्रणाम, आप कैसे हैं, परिवार कैसा है, अबकी बार माता रानी की कृपा से काम अच्छा चल रहा है, यदि आपने नवरात्रियों में किसी यजमान को अभी तक हाँ नहीं बोला हो तो कृपा करके हमारे घर में नवरात्रियों की पूजा कर दीजिए, मेरी इच्छा है कि मैं आपके आचार्यत्त्व में शतचंडी यज्ञ करवाऊँ | पंडित जी को यूँ तो बहुत पहले किसी ने नवरात्रियों की पूजा के लिए बोल दिया था लेकिन उन्होंने सोचा कि जीवन में प्रथम बार शतचंडी में आचार्यत्व करने का मौका मिल रहा है तो उसे मना कर दूँगा| और इस यजमान के यहाँ पूजा करने से दक्षिणा भी ज्यादा होगी और नए लोगों से भी परिचय हो जाएगा, ये सब सोच कर पंडित जी ने उत्तर दिया कि ठीक है यजमान जी अबकी बार आपके घर पर ही नवरात्रियों का आयोजन संपन्न करेंगे, माता रानी आपके कल्याण करे, यह कहकर फ़ोन काट दिया | पंडित जी ने सोचा मेरी अर्धांगिनी मेरे लिए कितनी सौभाग्यशाली है कल यहाँ आयी और आज मुझे शतचंडी यज्ञ करने का अवसर मिल गया| उन्होंने पत्नी को गले लगाया, प्रेम भरी दृष्टि से उसकी हिरण जैसी आँखों में देखा और उन्हीं में खो गए|

कुछ दिन बाद पंडित जी ने घर का किराया दिया, अब पंडित जी के पास सिर्फ खाने के लिए कुछ दिनों तक के लिए ही पैसे बचे हुए थे कि पूरे विश्व में कोहराम मचाता हुआ कोरोना वायरस भारत में भी प्रविष्ट हुआ जिसने कि पंडित जी की प्रथम बार दिल्ली आई हुई पत्नी को दिल्ली की रंगीन होली खेलने का मौका नहीं दिया और परिवार ने आपस में गुलाल लेकर सूखी होली से ही काम चला लिया| होली खत्म हुए तीन दिन ही हुए थे कि भारत में मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि होने लगी| अचानक शाम की चाय के समय पंडित जी का फ़ोन बजा, और उधर से आवाज आयी - गुरुजी प्रणाम, आप तो माहौल देख ही रहे हैं, बाहर क्या स्थिति हो रही है लोग बीमार पड़ रहे हैं, इसलिए अबकी बार रहने देते हैं, शतचंडी यज्ञ अगली नवरात्रियों में करेंगे, जय माता दी कहकर फ़ोन काट दिया| 

पंडित जी को अब कुछ समझ नहीं आ रहा है क्या करें, कुछ ही दिनों के लिए पैसे बचे हैं वो भी केवल खाने के लिए| यदि अभी कोई बीमार हो जाएगा तो क्या करेंगे|

अब नवरात्रियाँ शुरू हो गई हैं, पंडित जी खाली हैं, पैसों की चिंता मारे जा रही है, जो दाल-चावल यजमानों ने दिया था वो ही घर पर शेष है, किसी से माँगने की आदत है नहीं तो माँगने की हिम्मत भी नहीं हो रही है, बच्चा 4 साल का है एक बैट-बॉल के लिए पिछले दस दिनों से कह रहा है (पापा ने घर से चलते हुए वादा किया था कि दिल्ली जाते ही दिलवा दूँगा) कि दिलवा दो आज उसने उसके बदले थप्पड़ खाया है| 
पंडित जी को साथ ही ये भी चिंता है कि अगले एक-दो महीने तक शायद ही कोई पूजा करवाएगा|

डॉ. कल्पेश बहुगुणा